रविवार, 26 अगस्त 2012

जब कोई  सहारा न  मिला  अपनी  जान  बचने को....
तो शीशे ने  हिम्मत  कर   डाली  पत्थर  से  टकराने  की ...

रविवार, 19 अगस्त 2012

ऐसे  दरकिनार  हो  गये  ...
हाशिए के  पार  हो  गये ...
क्या थी वो जुदाई की खबर ...
लफ्ज़ तार -तार हो गये ..
बरसों बाद ये पता चला ...
हम कहीं शिकार हो  गये ...

मुझको  बुलाने  वालों  की तमाम  उम्र  गुजर  गई ...
और  मैं तुम्हारे  एक  इशारे  पे  आ गया ......
हम  जो अहसास की  चादर ओढ़े निकले ..
जिन्हें इन्सान समझते थे वो  पत्थर निकले.....
रुख  के चलकर चलकर हवा के  देख लिया ...
दो कदम लडखडा कर देख लिया .... 
कुछ न निकला सिवाए आईना ...
हमने परदा उठाकर देख लिया ....

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

जो  दिखाता  है खामियां सबकी ..
उसके घर में आईना नहीं होता ...
है दुआ माँ की जिस पर ....
वो कभी दर बदर नहीं होता....

शुक्रवार, 15 जून 2012

अहसास  बदल जाते  हें ....बस  ओर कुछ  नहीं .....
वरना मोहब्बत ओर नफरत दोनों एक  ही दिल  से होती है....


गुरुवार, 14 जून 2012

 उठके  उसकी  महफ़िल से  जब  चला  था  में ...
दूर तक  मनाने  फिर याद  उसकी आयी थी ...
इतना ना याद आया करो कि रात भर  हम सो  न  सकें ....
...सुबह सुर्ख आंखों की वजह पूछते  हें  तेरे शहर के  लोग .....

शनिवार, 9 जून 2012

आँगन  में   लगे  पेड़  से उल्फत  नहीं  होती ..
 छांव की  किसको   जरुरत  नहीं होती...

शुक्रवार, 25 मई 2012

करीब इतना  रहो  कि  रिश्तों में  प्यार  रहे ..
दूर  भी इतना  रहो कि आने  का इन्तजार  रहे ...
रखो उम्मीद  रिश्तों  के दरम्यान  इतनी ...
कि  टूटे उम्मीद  मगर  रिश्ता बरक़रार रहे...

रविवार, 20 मई 2012

जो  टूट  जाओगे तो क्या उड़ान  छु  लोगे....
इरादे   सख्त हैं  तो हर चट्टान  छु  लोगे...
तुम  होसलों के परों  को तो खोलकर  देखो.
बुलंदियों  के सभी  आसमान  छु  लोगे...

शनिवार, 19 मई 2012


वो  जब  भी    मिलते   हैं  अंदाज  जुदा   होता  है....
 चाँद  सौ  बार भी  निकले   मगर  चाँद  होता  है....
वक़्त  ऐसे ही  गुजरना है  तो  गुजर क्यूँ  नहीं  जाता ..
इस  खौफ  के  दरिया  से  उतर क्यूँ  नहीं  जाता.. 
हालात   से  समझोता  हम  रोज  करते  हैं.....
एक  जख्म  नहीं  भरता   सो  जख्म करते हैं...

शुक्रवार, 18 मई 2012

हम  समझते हैं  कि  आसमान   बदलता  है...
फूल  समझता  है कि    चमन    बदलता  है...
मगर  शमशान  की  ख़ामोशी  कहती है ...
लाशें   तो  वही  हैं  बस  कफ़न   बदलता है... 

बुधवार, 16 मई 2012

मेरा दिल   तो  पूरानी  दिल्ली  ..है.....
यहाँ  से  जो भी  गुज़रा है उसी ने  मुझको लूटा है..
उठके    उसकी  महफ़िल   से   जब  चला था  मैं ...  
दूर  तक  मनाने   फिर    याद  उसकी   आयी  थी ...

मंगलवार, 15 मई 2012

कागज  की   एक   नाव  अगर  पार   हो .गयी .. 
तो   ऐसे  में  कहाँ  समंदर  की    हार हो  गयी... 

सोमवार, 14 मई 2012

घरोंदे  तुमने देखे होंगे लेकिन  घर नहीं  देखा 
हवा  देखी  होगी आंधी की मगर   तेवर  नहीं देखा...
बड़ी है  और भी चीजें जहाँ मैं तुम  ये  क्या जानो...
कुएं के मेढक  तुमने अभी सागर नहीं देखा....

गुरुवार, 10 मई 2012

खिलोने की गली से आप क्यूँ  गुजरे.....
ये  बच्चों की इच्छा है ये समझोता नहीं करती ....
शहीदों की जमीं है जिसे हिंदुस्तान  कहते है.. 
बंजर होकर  भी बुजदिलों को पैदा नहीं करती....

रविवार, 22 अप्रैल 2012

सिलसिला

दुखी सभी हें यहाँ अपने अपने सुख के लिए..
तेरे लिए तो न कोई भी न रोने वाला है...
हजारों लोग इधर से गुजर गए फिर भी ...
ये सिलसिला न कभी बंद होने वाला है...
ये बाग सबका है या सिर्फ चन्द लोगों का...
ये फैसला तो बहुत जल्द होने वाला है...
जिसे हवाओं के रूख का न हो अंदाज़ा ...
वो शख्स जन लो कश्ती डुबोने वाला है...


गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

वह रातों के अंधियारों में भटकता रहा.....
बेरहम उजाला न जाने कहाँ सोता रहा... 
सोच-सोच कर वह ला दिया बुढ़ापा.... 
बच्चपन न जाने कहाँ खेलता रहा...----आमोद 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

ज़ख्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है...
ज़ख्म देकर पूछते है अब हाल कैसा है... 
किसी एक से गिला क्या करना यारों...
साडी दुनिया का मिजाज़ एक जैसा है... 
परछाइयां रोशनियों की मुहताज नहीं होती है... 
जिनका खुद का कोई पुख्ता माकन नहीं होता...
आज की दुनिया कल हमने ही तो बनाई थी.. 
यह कुटिया बड़ी शिद्दत से सजाई थी.... 
आज उठी आग तो हम रो बैठे... 
न सोचा कि यह आग कल हमने ही तो लगाई थी... 
अपनी प्यास को लेकर अब कहाँ जाएँ हम 
जिनके पास दरिया है उन्ही से लडाई है...

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

"हमारे  कुछ गुनाहों की सजा भी साथ चलती है..
अब हम तन्हा नहीं, दवा भी साथ चलती है..... 
अभी माँ जिन्दा है मेरी मुझे कुछ न होगा.... 
जब बाहर निकलता हूँ तो माँ की दुआ साथ चलती है..."
रिवाजे रस्म मेरे मुल्क के बहुत निराले हैं....
ज़मीर बेचने वालों के घर उजाले  हैं......
"वो कहते थे देखो चिटिओं के पर निकल आये 
बस इतनी सी बात थी घर छोड़ के हम बहार निकल आये..."
दोस्तों नमस्कार !! आम जिंदगी में कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जिनको हम हमेशा याद रखते हैं और उसको जीते हैं और कभी कभी हर वो व्यक्ति जो अपनी भावनाओं को कह नहीं पता तो उसे कागज पर उकेर देता है... कविता, शायरी और दोहे के रूप में मैं भी कभी कभी लिख लेता हूँ ... मगर कभी  कभी किसी अनाम कवि/शायर की लाईने  मिल जाती हैं जो बहुत ही खुबसूरत और दिल को छु लेने वाली होती हैं ... मैं अपने इस ब्लॉग पर उन्ही कवियों व शायरों की उकेरी हुयी कविताओं को संगठित करने की कोशिश  करी है.... अगर आपको उन रचनाकारों का नाम पता हो तो मेरी विनती है कि आप उसे मुझे अवगत करा देंगे.... आपका सुझाव  आमंत्रित है .... आपका आमोद ..