मंगलवार, 24 मई 2016

तुम जरा भी पिघल गए होते .....
गम ख़ुशी में बदल गए होते ...

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जो टूट जाओगे तो क्या उड़ान छू लोगे ...
इरादे सख्त हैं तो हर चट्टान छू लोगे ..
तुम होंसलों के परों को तो खोलकर देखो ...
बुलंदियों के सभी आसमान छू लोगे ...

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कहाँ वो बात कर रहा था खेलने की आग से ...
जरा सी आंच क्या लगी कि मौम सा पिघल गया ...

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कागज़ के फूल मिलते हैं गुलदस्तें  में सजे
ताजे हवा का कोई खरीदार अब नहीं ....

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प्यास लगी है चलो रेत निचोड़ा जाय  ....
समुन्दर अपनी किस्मत में नहीं समाने वाला ....

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राजे मुस्कराहट की हकीकत क्या है ...
कुछ तो गम है जो छिपाए हुए हो ....

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इस कदर चरागों को न जलाओं
कि रौशनी से हवाएं पागल हो जाएँ ...

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माँ जो रूठी है उसे मना लूँगा ....
मौम को पिघलने में देर ही कितनी लगती है ....

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वो आ रहे हैं, आते ही होंगे, आयेंगे ही ...
बस इसी इन्तजार में जिंदगी गुजारी है ....

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करीब आने की कोशिश में करूँ तो लेकिन
मेरे तुम्हारे दरम्यान कोई फासला तो दिखे ..... 
जिंदगी गुजरी है तमाम तन्हाईओं में  .......
ओर तुम अपनी महफ़िलों में मशगुल हो   .....

रुख में चलकर हवा के  देख लिया .......
दो कदम लड़खड़ा के देख लिया  .......
कुछ न निकला सिवाय आईना के... ...
हमने पर्दा उठाकर देख लिया  .......