Collection of poem
गुरुवार, 25 जून 2015
ये ऐश के बंदे सोते रहे फिर जागे भी तो क्या जागे
सूरज का उभरना याद रहा और दिन का ढलना भूल गए ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें