रविवार, 26 अगस्त 2012

जब कोई  सहारा न  मिला  अपनी  जान  बचने को....
तो शीशे ने  हिम्मत  कर   डाली  पत्थर  से  टकराने  की ...

रविवार, 19 अगस्त 2012

ऐसे  दरकिनार  हो  गये  ...
हाशिए के  पार  हो  गये ...
क्या थी वो जुदाई की खबर ...
लफ्ज़ तार -तार हो गये ..
बरसों बाद ये पता चला ...
हम कहीं शिकार हो  गये ...

मुझको  बुलाने  वालों  की तमाम  उम्र  गुजर  गई ...
और  मैं तुम्हारे  एक  इशारे  पे  आ गया ......
हम  जो अहसास की  चादर ओढ़े निकले ..
जिन्हें इन्सान समझते थे वो  पत्थर निकले.....
रुख  के चलकर चलकर हवा के  देख लिया ...
दो कदम लडखडा कर देख लिया .... 
कुछ न निकला सिवाए आईना ...
हमने परदा उठाकर देख लिया ....