रविवार, 22 अप्रैल 2012

सिलसिला

दुखी सभी हें यहाँ अपने अपने सुख के लिए..
तेरे लिए तो न कोई भी न रोने वाला है...
हजारों लोग इधर से गुजर गए फिर भी ...
ये सिलसिला न कभी बंद होने वाला है...
ये बाग सबका है या सिर्फ चन्द लोगों का...
ये फैसला तो बहुत जल्द होने वाला है...
जिसे हवाओं के रूख का न हो अंदाज़ा ...
वो शख्स जन लो कश्ती डुबोने वाला है...


गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

वह रातों के अंधियारों में भटकता रहा.....
बेरहम उजाला न जाने कहाँ सोता रहा... 
सोच-सोच कर वह ला दिया बुढ़ापा.... 
बच्चपन न जाने कहाँ खेलता रहा...----आमोद 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

ज़ख्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है...
ज़ख्म देकर पूछते है अब हाल कैसा है... 
किसी एक से गिला क्या करना यारों...
साडी दुनिया का मिजाज़ एक जैसा है... 
परछाइयां रोशनियों की मुहताज नहीं होती है... 
जिनका खुद का कोई पुख्ता माकन नहीं होता...
आज की दुनिया कल हमने ही तो बनाई थी.. 
यह कुटिया बड़ी शिद्दत से सजाई थी.... 
आज उठी आग तो हम रो बैठे... 
न सोचा कि यह आग कल हमने ही तो लगाई थी... 
अपनी प्यास को लेकर अब कहाँ जाएँ हम 
जिनके पास दरिया है उन्ही से लडाई है...

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

"हमारे  कुछ गुनाहों की सजा भी साथ चलती है..
अब हम तन्हा नहीं, दवा भी साथ चलती है..... 
अभी माँ जिन्दा है मेरी मुझे कुछ न होगा.... 
जब बाहर निकलता हूँ तो माँ की दुआ साथ चलती है..."
रिवाजे रस्म मेरे मुल्क के बहुत निराले हैं....
ज़मीर बेचने वालों के घर उजाले  हैं......
"वो कहते थे देखो चिटिओं के पर निकल आये 
बस इतनी सी बात थी घर छोड़ के हम बहार निकल आये..."
दोस्तों नमस्कार !! आम जिंदगी में कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जिनको हम हमेशा याद रखते हैं और उसको जीते हैं और कभी कभी हर वो व्यक्ति जो अपनी भावनाओं को कह नहीं पता तो उसे कागज पर उकेर देता है... कविता, शायरी और दोहे के रूप में मैं भी कभी कभी लिख लेता हूँ ... मगर कभी  कभी किसी अनाम कवि/शायर की लाईने  मिल जाती हैं जो बहुत ही खुबसूरत और दिल को छु लेने वाली होती हैं ... मैं अपने इस ब्लॉग पर उन्ही कवियों व शायरों की उकेरी हुयी कविताओं को संगठित करने की कोशिश  करी है.... अगर आपको उन रचनाकारों का नाम पता हो तो मेरी विनती है कि आप उसे मुझे अवगत करा देंगे.... आपका सुझाव  आमंत्रित है .... आपका आमोद ..